भारत और चीन के संबंध इस समय तनावपूर्ण चल रहे हैं जिसके आधार पर भविष्य में चीन से होने वाले आयात में कमी होना तकरीबन तय माना जा रहा है। भारत के दो बंदरगाहों मुंबई और चेन्नई में चीन से आने वाले माल को अभी तक क्लियर नहीं किया गया है। इसे नॉन टैरिफ बैरियर्स भी कहा जाता है। हालांकि कस्टम विभाग से इस माल को क्लियर नहीं करने की कोई वजह नहीं बताई गई है। लेकिन भारत में मैन्युफैक्चरिंग करने वाली अमेरिकी कंपनियों के चीन से आने वाले कच्चे माल के मुंबई और चेन्नई बंदरगाहों पर अटकने की वजह से अमेरिकी कंपनियों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
चीन द्वारा एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर तनाव बढ़ाने की वजह से भारत और चीन में संघर्ष उत्पन्न हुआ है जिससे भारत में चीन के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा पनप रहा है। लेकिन इस संघर्ष और गुस्से का खामियाजा भारत में मैन्युफैक्चरिंग कर रही अमेरिकी कंपनियों को उठाना पड़ रहा है क्योंकि इन कंपनियों को लगने वाला कच्चा माल चीन से भारत आता है जिसकी राह में कई अड़चनें आ रही हैं। इसलिए इस कंपनी के प्रतिनिधियों ने वाणिज्य मंत्रालय को पत्र लिख कर अपनी चिंता जाहिर की है।
मुंबई और चेन्नई बंदरगाह पर चीन से आनेवाला माल बड़ी मात्रा में पड़ा हुआ है। इस बारे में कस्टम विभाग ने ऐसे संकेत दिये हैं कि देश के कुछ बंदरगाहों विशेष रूप से चेन्नई और मुंबई बंदरगाह पर चीन से आये हुए माल को क्लियर करने में थोड़ा विलंब हो सकता है। परंतु इसके लिए कस्टम विभाग ने कोई कारण नहीं बताया है।
महाराष्ट्र टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक अमेरिका-भारत नीतिगत भागीदारी फोरम ने वाणिज्य मंत्रालय को अपनी चिंता से अवगत कराया है। इस फोरम के द्वारा भारत में मैन्युफैक्चरिंग करने वाली अमेरिकी कंपनियों का प्रतिनिधित्व किया जाता है। इन अमेरिकी कंपनियों को लगनेवाला कच्चा माल चीन से आता है। भले ही न्यूनतम स्तर पर हो पंरतु बंदरगाहों पर काम जल्दी शुरू होना चाहिए ऐसी मांग इस फोरम ने की है। चीन से आये हुए माल में टेलीकम्युनिकेशन, ऑटो, मेडिकल उपकरण और थोक माल शामिल है।
भारत में मैन्युफैक्चरिंग करने वाली करीब 50 अमेरिकी कंपनियों का माल इसमें शामिल है। कुछ अमेरिकी दूरसंचार कंपनियां भारत में मैन्युफैक्चरिंग करती हैं लेकिन इसके लिए लगनेवाला कच्चा माल चीन से मंगाना पड़ता है। सरकार ने इस बारे में कोई भी स्पष्ट सूचना दिये बगैर माल बंदरगाहों पर रोके जाने से पारदर्शिता पर अमेरिकी कंपनियों ने प्रश्नचिन्ह लगाया है और कहा है यह कारोबार लिए खतरा है। इसका भारत में होने वाली मैन्युफैक्चरिंग पर बुरा असर होगा और विदेशी निवेश पर भी इसका असर पड़ेगा।
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